“समाज का सबसे बड़ा खतरा अपराध नहीं है, बल्कि वह खामोशी है जो गलत देखकर भी कुछ नहीं बोलती।”
कलयुग का अंधेरा: जब इंसानियत कमजोर पड़ने लगे प्रस्तावना आज का समय बहुत तेज़ी से बदल रहा है। तकनीक बढ़ रही है, शहर बड़े हो रहे हैं, लोग अधिक पढ़े-लिखे हो रहे हैं। लेकिन इस सबके बीच एक सवाल बार-बार सामने आता है—क्या इंसानियत भी उतनी ही मजबूत हो रही है? समाज के कई हिस्सों से ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं जो हमें झकझोर देती हैं। खासकर जब किसी माँ, बहन या बेटी की गरिमा और सुरक्षा पर खतरा दिखाई देता है, तो यह केवल एक व्यक्ति का दर्द नहीं रहता—यह पूरे समाज की परीक्षा बन जाता है। एक सभ्य समाज की पहचान यही होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और असहाय लोगों की कितनी रक्षा करता है। अगर किसी भी समाज में महिलाएँ सुरक्षित महसूस न करें, तो वह समाज सच में मजबूत नहीं कहा जा सकता। बदलती सोच और उसका असर आज के समय में कई लोग यह महसूस करते हैं कि समाज में सम्मान और संवेदनशीलता कम होती जा रही है। कई बार ऐसा लगता है कि कुछ लोग दूसरों को इंसान की तरह नहीं, बल्कि केवल एक वस्तु की तरह देखने लगे हैं। यह सोच बहुत खतरनाक है। क्योंकि जब इंसान दूसरे इंसान को केवल शरीर या लाभ के रूप में देखने लगे, तो सम्मान और मर्यादा धीरे...