घर भी नहीं… बाहर भी नहीं: लड़कियों की सुरक्षा पर कड़वी सच्चाई”
🔥 घर सुरक्षित नहीं… बाहर सुरक्षित नहीं… “घर सुरक्षित नहीं… बाहर सुरक्षित नहीं…” आज हर लड़की के मन में यही डर है। लेकिन सवाल ये है—आखिर गलती कहाँ है? हमारे समाज में बचपन से ही बेटियों को सिखाया जाता है— कैसे बैठना है, कैसे बोलना है, कहाँ जाना है, क्या पहनना है। हर कदम पर “मर्यादा” का पाठ पढ़ाया जाता है। उन्हें यह एहसास कराया जाता है कि उनकी एक छोटी सी गलती भी उनके चरित्र पर सवाल खड़े कर सकती है। लेकिन क्या कभी हमने यही बातें अपने बेटों को सिखाई? उन्हें किसने बताया कि “ना” का मतलब क्या होता है? उन्हें किसने सिखाया कि किसी लड़की की इज्जत करना क्या होता है? उन्हें किसने रोका, जब उनकी नजरें गलत दिशा में गईं? यही असली कमी है। समाज ने बेटियों को सीमाओं में बांध दिया, और बेटों को बिना सीमाओं के छोड़ दिया। एक तरफ डर सिखाया गया… दूसरी तरफ अधिकार। यही वजह है कि आज बेटियाँ खुद को हर जगह असुरक्षित महसूस करती हैं— घर में भी… जहाँ उन्हें सबसे ज्यादा सुरक्षित होना चाहिए, और बाहर भी… जहाँ हर कदम पर डर उनका पीछा करता है। लेकिन अब वक्त बदलने का है। हमें सिर्फ बेटियों को मजबूत नहीं बनाना, बल्कि बेटो...