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दिखावे का ज़हर और घर का नरक: सोच बीमार हो गई तो समाज कैसे बचेगा

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🔥जब सोच बीमार हो जाए: दिखावे का नरक और इंसानियत की मौत आज हम जिस दौर में साँस ले रहे हैं, वहाँ सबसे बड़ी तबाही कोई एक घटना नहीं है। सबसे बड़ी तबाही है — हमारी सोच का धीरे-धीरे मर जाना। हर सुबह अखबार और फोन की स्क्रीन पर खून से सनी खबरें आती हैं — कत्ल, बलात्कार, घरेलू हिंसा, भूख से तड़पते बच्चे। लेकिन हम अब इनसे अंदर तक नहीं हिलते। बस स्क्रॉल करते हुए आगे बढ़ जाते हैं। जैसे ये सब हमारी जिंदगी का सामान्य हिस्सा बन चुका हो। जब दर्द भी हमें सामान्य लगने लगे, तब समझ लो — सोच बीमार हो चुकी है। हमने विकास की दौड़ में आगे निकल लिया, लेकिन इंसानियत को रास्ते में ही छोड़ दिया। हमने दिखावा करना सीख लिया, लेकिन जिम्मेदारी को कचरे में फेंक दिया। सबसे खतरनाक — गलत को देखकर चुप रहना अब हमारी आदत बन गई है। चुप्पी कोई तटस्थता नहीं, ये गलत का चुपचाप साथ देना है। 🏠 घर के अंदर पनपता असली नरक अगर समाज कहाँ जा रहा है, ये समझना है तो बाहर मत देखो — अपने घर के अंदर झाँको। मोबाइल मिलते ही बच्चे को लगता है कि अब सारी दुनिया उनकी मुट्ठी में है। रात भर स्क्रीन की नीली रोशनी में जागना, दोपहर तक मरे हुए जैसे सोन...

छतरपुर की चिता और लखनऊ की उजड़ी बस्तियाँ: विकास या साज़िश? Ground Reality of Displacement in India

                            विकास या विनाश... 🔥 “छतरपुर की चिता, लखनऊ की बस्तियाँ: विकास या विस्थापन की सच्चाई?” भारत में “विकास” शब्द जितना चमकदार सुनाई देता है, उसकी ज़मीनी सच्चाई उतनी ही कठोर और चुभने वाली है। बड़े-बड़े वादे, ऊँची-ऊँची इमारतें, चौड़ी सड़कें—इन सबके पीछे अक्सर एक ऐसी कहानी छिपी होती है, जिसे सुनना कोई नहीं चाहता। वो कहानी है उजड़ते घरों की, टूटते सपनों की, और उन लोगों की, जिनकी आवाज़ कभी मुख्यधारा तक पहुँच ही नहीं पाती। छतरपुर में आदिवासी महिलाओं का उग्र “चिता” आंदोलन इसी दर्द की सबसे तीखी तस्वीर बनकर सामने आया है। जब एक महिला, जो जीवन की प्रतीक मानी जाती है, खुद चिता सजाने की बात करती है, तो ये सिर्फ विरोध नहीं होता—ये उस व्यवस्था के खिलाफ अंतिम चीख होती है, जिसने उसे हर मोर्चे पर निराश किया है। ये महिलाएँ कोई सनसनी नहीं पैदा कर रहीं, बल्कि अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए खड़ी हैं। उनके पास न राजनीतिक ताकत है, न संसाधन—बस एक अडिग जिद है कि “हमें हमारा हक चाहिए।” लेकिन सवाल यह है—क्या ये कहानी सिर्फ ...