शादी या सौदा
समाज के नाम पर आज भी कई बेटियों की ज़िंदगी तय कर दी जाती है। यह लेख उस कड़वी सच्चाई को उजागर करता है जहाँ शादी, इज़्ज़त और परंपरा के नाम पर बेटियों के सपनों की बलि चढ़ा दी जाती है। क्या हम सच में बदल रहे हैं? समाज का नाम लेकर ढोंग करना बंद करो… सच ये है कि “समाज” कोई बाहर की ताकत नहीं है, ये हम ही हैं—हमारे फैसले, हमारी सोच, हमारी चुप्पी। अगर बेटी को सम्मान, सुरक्षा और सपने देने की हिम्मत नहीं है, तो उसे इस दुनिया में लाने का अधिकार भी क्यों लेते हो? बेटी की किस्मत अक्सर वही लोग लिख देते हैं, जो उसे सबसे ज्यादा प्यार करने का दावा करते हैं। जब वो ज़िंदा होती है, तो उसकी आवाज़ दबा दी जाती है… उसके सपनों को “इज़्ज़त” के नाम पर कुचल दिया जाता है… और जब वो टूट जाती है, तो वही लोग समाज के सामने आँसू बहाकर अपने कर्तव्य निभाने का नाटक करते हैं। शादी… जो एक रिश्ता होना चाहिए था, उसे सौदे में बदल दिया गया है। जहाँ लड़की की खुशी नहीं, उसकी कीमत देखी जाती है… जहाँ सज-धज कर आने वाले लोग रिश्ता नहीं, जैसे एक “खरीद” करने आते हैं। और फिर शब्दों को बदलकर कहा जाता है— “हमने अपनी बेटी को विदा किया ह...