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जब 8 महीने की बच्ची से लेकर 90 साल की महिला तक सुरक्षित नहीं — समाज की सोच पर सबसे बड़ा सवाल”

 जिस देश में 8 महीने की बच्ची से लेकर 90 साल की महिला तक सुरक्षित नहीं — क्या हमने सच में समाज बनाया है? कभी-कभी इंसान सोचने पर मजबूर हो जाता है कि क्या हम सच में एक सभ्य समाज में जी रहे हैं या केवल सभ्यता का दिखावा कर रहे हैं। क्योंकि जिस देश और समाज में 8 महीने की मासूम बच्ची से लेकर 90 साल की बुज़ुर्ग महिला तक सुरक्षित नहीं हो, जहाँ किसी महिला के साथ बलात्कार हो जाए और फिर उसे ही समाज की शर्म का बोझ उठाना पड़े, तो सवाल केवल अपराधियों पर नहीं उठता — सवाल पूरे समाज की सोच पर उठता है। यह सच्चाई जितनी कड़वी है, उतनी ही डरावनी भी है। अपराध केवल शरीर पर नहीं होता, समाज की आत्मा पर भी होता है जब किसी महिला या बच्ची के साथ बलात्कार होता है तो वह केवल एक इंसान के साथ हुआ अपराध नहीं होता। वह समाज की आत्मा पर लगा एक घाव होता है। लेकिन दुखद बात यह है कि कई बार समाज उस घाव को भरने की कोशिश नहीं करता, बल्कि उसे छुपाने की कोशिश करता है। पीड़िता को कहा जाता है — चुप रहो… किसी को मत बताओ… वरना बदनामी हो जाएगी। सोचिए, अपराध किसने किया? अपराधी ने। लेकिन शर्म किसे दी जाती है? पीड़िता को। यही वह मान...