अपने ही बन जाते हैं पिंजरा: जब असली खतरा घर के अंदर होता है
खतरा बाहर नहीं… सबसे ज्यादा अपने ही होते हैं।" आवारा कुत्ता जब भौंकता है, तो हम तुरंत पत्थर या लकड़ी उठा लेते हैं। क्योंकि वो सामने होता है, दिखता है, और हमें पता होता है—खतरा कहाँ है। लेकिन जिंदगी के असली खतरे ऐसे नहीं होते। वो भौंकते नहीं… चुप रहते हैं। वो सामने नहीं आते… हमारे बीच रहते हैं। सबसे खतरनाक वही होते हैं, जो अपने बनकर पास आते हैं। जो रिश्तों, भरोसे और अपनापन के नाम पर धीरे-धीरे हमारी सोच, हमारी आज़ादी और हमारे सपनों को घेर लेते हैं। वो कहते हैं—“ये मत करो, लोग क्या कहेंगे।” “इतना मत उड़ो, गिर जाओगी।” “हम तुम्हारे भले के लिए कह रहे हैं।” और हम मान लेते हैं… क्योंकि वो अपने होते हैं। यहीं से पिंजरा बनना शुरू होता है— बिना सलाखों का, बिना ताले का। जहाँ इंसान बाहर से आज़ाद दिखता है, लेकिन अंदर से कैद हो चुका होता है। सब कहते हैं—समाज ऐसा है, वैसा है। लेकिन सच ये है कि समाज कोई अलग चीज़ नहीं है। समाज हम ही हैं। हमारी सोच, हमारे फैसले और हमारी खामोशी। हर बार जब हम किसी को रोकते हैं, हर बार जब हम किसी की आवाज़ दबाते हैं, हर बार जब हम गलत देखकर भी चुप रहते हैं— हम उसी पिंजर...