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कपड़े नहीं सोच दोषी है | खामोशी क्यों बन रही है गुनाह की ताकत? | Hindi Writer Rishika” लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कपड़े नहीं सोच दोषी है | खामोशी क्यों बन रही है गुनाह की ताकत

 ये दुनिया सच को दबाती नहीं… उसे दफन करने की कोशिश करती है, लेकिन सच की फितरत है—वो राख से भी उठकर ज़िंदा हो जाता है। और आज सबसे बड़ा गुनाह अपराध नहीं है… सबसे बड़ा गुनाह है—खामोशी। जब मासूमियत चीखती है और दरिंदे हँसते हैं, तो दोष सिर्फ उस एक इंसान का नहीं होता जिसने गुनाह किया… दोष उस पूरे समाज का होता है, जो सब कुछ देखकर भी सिर झुकाकर निकल जाता है। हम बहस करते हैं— कपड़ों पर, वक्त पर, लड़की के व्यवहार पर… लेकिन कभी ये नहीं पूछते कि सोच इतनी सड़ी हुई क्यों है? दो दिन की बच्ची ने कौन सा “उकसाने वाला कपड़ा” पहना था? फिर भी अगर उसके साथ दरिंदगी होती है, तो ये साफ है— गुनाह शरीर में नहीं, दिमाग में पलता है… और ये दिमाग समाज ही बनाता है। कपड़ों को दोष देना आसान है… क्योंकि इससे हमें अपने भीतर झाँकने की जरूरत नहीं पड़ती, और सच्चाई से भागने का बहाना मिल जाता है। लेकिन सच्चाई कड़वी है— जब इंसान हैवान बन जाता है, तो उसे किसी वजह, किसी बहाने, किसी मौके की जरूरत नहीं होती। और ये सड़न यहीं नहीं रुकती… जब धर्म के नाम पर पाखंड पनपता है, जब ढोंगी लोग “बाबा” बनकर भरोसा लूटते हैं, तो वो सिर्फ अपरा...