सहमति क्यों जरूरी है

 शादी कोई लाइसेंस नहीं है… औरत कोई प्रॉपर्टी नहीं है।


यह सिर्फ एक लाइन नहीं, बल्कि उस सच्चाई की चीख है जिसे सदियों से दबाया गया है। एक चुटकी सिंदूर भर देने से किसी इंसान की इच्छा, उसकी पहचान, उसका अधिकार खत्म नहीं हो जाता। लेकिन समाज ने बार-बार यही सिखाया—शादी के बाद औरत की “ना” का कोई मतलब नहीं। यही सोच सबसे खतरनाक है।


अंधेरे कमरे में, बंद दरवाज़ों के पीछे, रिश्ते का नाम देकर जिस जबरदस्ती को छुपाया जाता है, वो प्यार नहीं होता—वो हिंसा होती है। जब किसी की खामोशी को उसकी सहमति मान लिया जाता है, तब एक इंसान अंदर ही अंदर टूटता रहता है। डर, शर्म और समाज का दबाव उसे बोलने नहीं देता। और यही खामोशी इस अन्याय को ज़िंदा रखती है।


सबसे कड़वी सच्चाई यह है कि बहुत से लोग आज भी इसे “हक़” मानते हैं, अपराध नहीं। लेकिन सच यह है—बिना सहमति के हर संबंध, हर स्पर्श, हर मजबूरी एक ज़ुल्म है। शादी इस ज़ुल्म को वैध नहीं बनाती।


अब सवाल यह नहीं है कि यह गलत है या नहीं। सवाल यह है कि हम इसे कब तक सहेंगे?


समाज को बदलना होगा। कानून को मजबूत होना होगा। और सबसे ज़रूरी—लोगों को अपनी सोच बदलनी होगी। औरत कोई वस्तु नहीं, कोई अधिकार नहीं, बल्कि एक इंसान है—जिसकी इच्छा, सम्मान और स्वतंत्रता उतनी ही ज़रूरी है जितनी किसी और की।


अगर आज भी हम चुप रहे, तो यह अंधेरा और गहरा होता जाएगा। लेकिन एक आवाज़ उठी, तो कई आवाज़ें जुड़ेंगी। और वही आवाज़ इस अंधेरे को तोड़ सकती है।


क्योंकि “ना” आज भी “ना” है—शादी के बाद भी।

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