दो वक्त की रोटी के बदले एक ज़िंदगी — औरत की अनकही कहानी

 “एक चुटकी सिंदूर”…

किसी के लिए प्यार की निशानी,

तो किसी के लिए एक ऐसी लकीर—जिसके बाद उसकी दुनिया छोटी कर दी जाती है।

कई कहानियों में,

लड़की की ज़िंदगी को शादी के नाम पर बदल दिया गया—

उसकी सोच, उसकी रूह तक को ढाल दिया गया

किसी और की पसंद, किसी और के नियमों में।

दो वक्त की रोटी, दो जोड़ी कपड़े…

और बदले में उसकी आज़ादी, उसके सपने, उसका वजूद।

ये रिश्ता कम… सौदा ज़्यादा लगता है।

लेकिन अंधेरा सिर्फ एक तरफ नहीं है।

हर लड़की गुलाम नहीं बनती,

और हर घर नरक नहीं होता।

कुछ औरतें “हाउसवाइफ” बनती हैं—मजबूरी से नहीं,

बल्कि अपने फैसले से, अपने प्यार से।

और कुछ पुरुष ऐसे भी होते हैं

जो सपनों को तोड़ते नहीं… उन्हें जीने देते हैं।

फिर भी सच ये है—

कोई लड़की बचपन में ये सपना नहीं देखती

कि वो सिर्फ जिम्मेदारियों में सिमट जाए।

वो देखती है—

खुली हवा में सांस लेने का हक,

खुली आँखों से दुनिया देखने का सपना,

अपने नाम से पहचान बनाने की चाह।

डार्क सच्चाई ये है—

समाज ने कई बार उसके सपनों को चूल्हे की आग में झोंक दिया,

और उसकी खामोशी को ‘संस्कार’ कह दिया।

लेकिन अब—

कहानी बदल रही है।

अब वो झुकेगी नहीं,

अब वो पूछेगी—“क्यों?”

क्योंकि अब सिंदूर उसकी किस्मत नहीं लिखेगा,

वो खुद अपनी कहानी लिखेगी।

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