आवाज़ दबेगी नहीं: औरत की सच्चाई, समाज की सोच और कड़वा सच



वो कहती रही—तुम्हारी उम्र कम है, तुम्हें समझ नहीं।

मैंने सोचा… शायद सच बोलने के लिए उम्र नहीं, हिम्मत चाहिए।


हमारी आवाज़ कम नहीं है,

बस लोगों को सच सुनने की आदत नहीं है।


जिस औरत की कोख से जन्म लिया,

जिसकी छांव में पलकर बड़े हुए,

उसी को गिराने में एक पल भी नहीं लगता।


नाम देना आसान है,

इल्ज़ाम लगाना और भी आसान।

पर सच इतना आसान नहीं होता।


जिसे तुम “बेश्या” कहते हो—

वो खुद किसी के दरवाज़े नहीं जाती,

दरवाज़े तो हमेशा उसी की ओर खुलते हैं।


फिर सवाल ये है—

गलत कौन है?

वो, जो हालात में फंसी है…

या वो, जो हालात बनाता है?


सदियों से यही होता आया है—

औरत को गलत ठहराओ,

और मर्द को बरी कर दो।


क्योंकि सवाल उठाना मुश्किल है,

और सच स्वीकार करना उससे भी ज्यादा।


लेकिन अब—

औरत समझ रही है,

चुप्पी अब उसकी मजबूरी नहीं,

उसकी ताकत बन रही है।


अब वो डरकर नहीं झुकेगी,

अब वो सोचकर बोलेगी।


क्योंकि सच को जितना दबाओगे,

वो उतना ही तेज़ गूंजेगा।


और याद रखना—

बदलाव आवाज़ से आता है,

और अब आवाज़ उठ चुकी है।

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